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Sufi - Bhavin Shastri
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सूफ़ी ना सोच... ना धर्म... ना ढंग... ना संगीत... ना राह... ना मंज़िल... ये रूह है 

सूफी न सुबह है न शाम है, क्योंकि सुबह होती है शाम के इंतज़ार में और शाम को ढल कर रात में डूब जाने की आदत है, फूलों का खिलना इसे नहीं कह सकते क्योंकि फूल अपने निर्धारित जीवन के साथ खिलते हैं और मर जाते हैं या मार दिए जाते हैं, सोच के दायरे में इसे नहीं बाँधा जा सकता क्योंकि उसके बदलने और मुतास्सिर होने में वक़्त नहीं लगता, धर्म का नाम देना इसलिए ग़लत होगा क्योंकि धर्म के अपने उसूल होते हैं या धर्म का इस्तेमाल इंसान को डराने के लिए या तबकों में बाँट देने के लिए किया जाता है, सूफ़ी का कोई ढंग नहीं होता क्योंकि जहाँ ढंग आ जाये वहाँ उसके इर्द-गिर्द दीवारें बना ली जाती हैं, संगीत कहना भी यूं ग़लत है क्योंकि संगीत में उतार है चढ़ाव है, भाव है रस है और अपनी बात कहने का तरीका है... राह इसलिए भी नहीं क्योंकि उस पर चलने का कोई मकसद होता है  ज़रूरत होती है, सूफी मंज़िल नहीं है क्योंकि मंज़िल पर पहुँचने के ज़रिये होते हैं तय्यारी होती है और मंज़िल को हासिल कर लेने के बाद उस पर बने रहने की जद्दो-जहद...

सूफी रूह है... इसका न कोई आकर है, न कोई रंग है, पर रूह अपना वजूद रखती है इसे देखा नहीं जा सकता सिर्फ अनुभव किया सकता है, रूह को चुना नहीं जा सकता ना इन्सान कभी मेहनत कर के या कोई इम्तेहान देकर सूफी बनता है, जब संसार में कोई भी शरीर जन्म लेता है तो रूह उसे चुनती है और शरीर के होने के बाद रूह कहाँ जाती है इसका जवाब कोई नहीं दे सकता... रूह अगर सोच होती तो ज़िन्दा लोगों में नज़र आती, अगर धर्म होती तो फैलती या सिमटती हुई दिखती, ढंग होती पाई जाती, संगीत होती तो सुनाई या गुनगुनाई जाती, राह होती तो लोग उस पे चलने लगते और मंज़िल होती हो उसे सजा कर उसके अनुयाई बना दिए जाते... 
रूह आज़ाद है, सूफी है, अपनी इबादत आप है, इकाई है, 
सूफी सिर्फ रूह का अनुभव है...
Mai Se Moksh - Bhavin Shastri
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मैं से मोक्ष से मैं 
बस गुजरने का हुनर 

लफ्ज़ चाहे एक हो पर उसके कई मतलब हो सकते हैं, अच्छे भी और बुरे भी, हमारे साथ जब जो चीज़ गुज़र रही होती है या हम किसी चीज़ से गुज़र रहे होते हैं तो उस दरमियान सही लफ्ज़ के सही मतलब को समझना सबसे ज़रूरी होता है...
“मैं” यानि खुद, मैं यानि ख़ुदी, मैं यानि अहंकार... वैसे मोक्ष यानि मुक्ति और मोक्ष यानी छुटकारा, मोक्ष यानि निजात....
हमें अपने अन्दर के मैं की पहचान होनी चाहिए, और ज़रूरी नहीं की ये पहचान अपने ही विवेक से आये, समझदार इंसान वो है जो दूसरों की गलतियों और भलाइयों से सीखे, ज़िन्दगी अगर कोई अपने अहंकार के मैं को लेकर जीता है तो खुद बा खुद अपना छुटकारा पाने का इंतेज़ाम करता है, वहीँ कोई अपनी खुदी के मैं मैं जीता है तो अपनी निजात का सामन और बोझ साथ लिए फिरता है... जबकि ज़रूरत होती है अपने अन्दर खुद को तलाशने की ताकि मुक्ति का मोक्ष प्राप्त कर सके...
 
ये दुनिया, हमारा धर्म, हमारा इश्वर, यहाँ पर मौजूद चीज़ें, सारे रिश्ते, सारी खुशियाँ और सारे ग़म हमारे अन्दर मौजूद होते हैं और  हम हैं की उन्हें सांसारिक चीज़ों में तलाशते हैं, मंजिल हमारे अन्दर होती है और हम हैं की रास्तों पर भटकते हैं... इसलिए कहीं ठहर नहीं पाते हमेशा गुज़रते रहते हैं, हम वक़्त को गुज़रते हुए देखते हैं बिना कभी ये सोचे की शायद वक़्त स्थिर हो सकता है और हम गुज़र रहे हैं...
हम जीते हैं मोक्ष की प्राप्ति के लिए वो मोक्ष जो हमारे अन्दर है, और  उस तक पहुँचने का रास्ता हमारे “मैं” पर निर्भर करता है, सही रास्ते पर चलने से मोक्ष की प्राप्ति तो हो ही सकती है और इस बात का भी पता चल सकता है की मोक्ष भी हमें पाना चाहता हो...
ज़रूरी है गुज़रना और गुज़रने का हुनर... 
मोक्ष के लिए नहीं खुद के लिए...
Har Sabra Hijra Ho Gaya - Bhavin Shastri
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हर सब्र हिज्र हो गया,
हर सांस स्पर्श
इस बात का कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता की इंसान ने बोलना कब सीखा, ये बात तो साफ़ है की साँस लेना उसे आता होगा तभी ज़िन्दा रह पाया होगा, या उसी वजह से उसका जन्म हुआ होगा, पर इंसान साँस लेता है तो ज़िन्दा रह पाता इस बात को समझने में कई सदियाँ लगी होंगी, साँस रुकने से उससे मरने का अनुभव हुआ होगा, साँस तेज़ चलने घबराहट महसूस हुई होगी, साँस नहीं ले पाया होगा तो ज़रूर छटपटाया होगा...
साँस में साँस जब आई होगी तो रंग देख पाया होगा, पानी को महसूस कर पाया होगा, और शायद उसे महसूस हुआ हो की जब साँस बिलकुल सही सलामत हो जाए तो उस अवस्था को सब्र कहते हैं...
इन सब अनुभवों को सांझा करने के लिए उसे ज़बान की ज़रूरत पड़ने लगी, इशारों और चित्रों से भावों को बताना आसान ज़रूर हो गया हो, पर ज़बान से उस भाव को, उस एहसास को उस सब्र को एक लफ्ज़ के ज़रिये बताना ना जाने कितनी बनी-आदम की जातों को ले गया....

इन सब के दरमियान जो मौजूद रहा वो था सब्र, सब्र कहीं पहुँचने का, कुछ हासिल करने का, रोशनाई का सब्र और सब्र एक कल का... जब भी जिस वक़्त इंसान से ज़बान सीखी तो शायद एहसास के हिसाब से लफ़्ज़ों का भी वज़न तय किया, किसी भी लफ्ज़ को बोलने से पहले उसका एहसास ज़ेहन में आ जाता, उस एहसास का रंग, उसकी शिद्दत, उससे रु-बा-रु होने का ख्याल और उसे सुनने के बाद उसके जवाब में कोई लफ्ज़ ज़ाहिर करना... इस तरह इंसान कई सदियों के ग़मों और खुशियों को एक लफ्ज़ में बताना सीखता चला गया...

कहा जाता है सब्र आ जाना याने पूर्ण रूप से किसी भी चीज़ को हासिल कर लेना या उसको खुद से बहुत दूर जाते हुए स्वीकार कर लेना... हिज्र याने वियोग, जुदाई, किसी से अलग होना जितना रूखा और भारी लफ्ज़ है उससे कहीं इस लफ्ज़ का मंज़र,हिज्र सुनते ही जो तस्वीर ज़ेहन में आती है वो या तो किसी सेहरा की होती है या कहीं किसी दलदल की... जहाँ ज़िन्दगी तो होती तो पर सिर्फ जीने वाले की हिम्मत और  शर्तों पर...
पर जब इन्सान का सब्र ही उससे हिज्र कर जाता है तब भी उसके पास बचता है उसके होंसले की तरह हर तरफ राह दिखाता हुआ सेहरा, दलदल की तरह और गहरी होती हुई उसकी सोच, ओर रेत की तरह खुद में खुद की जगह बनाती हुई उसकी सांसें... 

ये सांसें स्पर्श कराती हैं तमाम ज़िन्दगी में हासिल हुए सब्र का, हिज्र हो चुके एहसासों, ख्यालों और ख़्वाबों का... 
और यकीन दिलाती हैं उसे खुद अपनी साँसों का...
Anant Hona Tha - Bhavin Shastri
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अनंत होना था...
तो हमने हमें मार कर,चाँद को चुना 
अनंत याने जिसका अंत न हो... जो असीम हो, 
इंसान का खुद को अनंत करना असीम करना याने खुद में मौजूद खुद को तलाश कर पहचान कर एक ऐसे मक़ाम पर ले जाना जहाँ से बाकी दुनिया, रिश्ते, समाज और बाकी चीज़ें इक ईकाई नज़र आये, और न सिर्फ़ नज़र आये वो खुद को इस ईकाई में महसूस कर सके और बाकी चीज़ों को दूसरी ईकाई, जहाँ से दुनिया, समाज और रिश्ते उसे सम देखें और वो इन चीज़ों की गहराई को समझ सके, जैसे दुनिया में मौजूद होकर जब चाँद को देखते हैं तो सम नज़र आता है, न उसकी गहराई, उसकी बनावट, उसका ताप सब कुछ अनुमान होता है, और जब तक अनुमान लगाया जाता है तब तक हर ख्याल हर लफ्ज़ उसकी सच्चाई के लिए होता है, इंसान की बुराई उसके आस पास बोले सुने और देखे जा रहे अनुभव से बढती और घटती है, जितना वो उसमे लीन होता जाता है, उतना ही इन चीज़ों को खुद के अन्दर घर करने लगता है, और इसी को सात्विक समझ लेता है और अपने अन्दर मौजूद ख़ुद को कहीं रख देता है, ख़ुद को पहचानना खुद से मिलना शायद ही कभी उसे याद रहता है...

या यूं कहा जाए कोई शक्ति है जो उसे खुद से अलग कर देती है, इस शक्ति का हावी हो जाना वैसे होता है जैसे अमावस्या चाँद पर खुद को हावी कर लेती है, उसे टुकड़े टुकड़े छुपाती हुई उसे निगलने की धुन में होती है और उसके इरादों को देखते हुए उसका साथ तो देता है पर कहीं जाता नहीं है, वहीँ खुद को तलाशते हुए खुद की पहचान बनाये हुए दोबारा चमक उठता है...

या चाँद खुद को अनंत के उस मक़ाम पर लेकर जा चूका है जहाँ से सब कुछ उसके लिए सम है और सबके के लिए वो, सिर्फ दो ईकाई एक दुसरे का महत्व समझते हुए एक दुसरे का साथ देते इक रिश्ते को जीती हैं, एक अंतहीन अंत के इंतज़ार में, 
ख़ुद के इंतज़ार में....